किसने कह दिया कि गैर मुसलमानों से दोस्ती मना है?

सलीम भाई! आपसे किसने कह दिया कि अल्लाह ने काफिरों से दोस्ती को मना फ़रमाया है? पहली बात तो यह कि काफिर कौन है, इसका निर्धारण आप कैसे करोगे? दिलों के राज़ तो केवल अल्लाह ही जानता है..... दूसरी बात अगर कोई अपने-आप को काफ़िर मानता भी है तब भी उसके साथ दोस्ती करने की मनाही हरगिज़ नहीं है. ईश्वर (अल्लाह) तो स्वयं कुरआन में फरमाता है कि वह अपने नाफरमान बन्दे से भी एक माँ से भी करोडो गुना ज्यादा मुहब्बत करता है. बिना यह देखे के कि वह उसे अपना ईश मानता है अथवा नहीं, यहाँ तक कि उसकी आखिरी साँस तक उसका इंतज़ार करता है. बल्कि तुम जिस तरफ इशारा कर रहे हो अगर तफसील से और पूरा पढोगे तो पता चलेगा कि वह आदेश उनके लिए थे जिन्होंने मुसलमानों पर हमला किया था, अर्थात जो मुसलमानों के दुश्मन थे और उनको अपने घरों से निकालने पर अमादा थे.

उपरोक्त बातें केवल मेरी नहीं हैं, बल्कि देखिये अल्लाह स्वयं कुरआन में आपकी बात का क्या जवाब देता है:

[60:8] अल्लाह तुम्हे इससे नहीं रोकता है कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और ना तुम्हे तुम्हारे अपने घर से निकाला. निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है.

[60:9] अल्लाह तो तुम्हे केवल उन लोगो से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हे तुम्हारे अपने घरों से निकला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की. जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम हैं.


अब आप क्या कहेंगे?

कुछ लोग कम अक्ली अथवा नफरत में इस्लाम की बातों को बिना पुरे परिप्रेक्ष में देखे, आधी-अधूरी बातों से लोगो को गुमराह करते हैं तथा लोगों को इस्लाम से दुश्मनी पर आमादा करते हैं, आपके उपरोक्त लेख में भी उसी तरह की बातें हैं. आपको मेरी बातें शायद कडवी लगें लेकिन इत्मिनान से गौर करोगे तो इंशाल्लाह आसानी से समझ जाओगे.

रही बात त्योहारों की तो, आपसी संबंधो को सदृढ़ करने के लिए एक-दुसरे के त्योहारों में शिरकत करना मना नहीं होता है, केवल उन कार्यों को करना मना होता है जिनका सम्बन्ध शिर्क से होता है अर्थात ईश्वर (अल्लाह) के अलावा किसी और की पूजा (इबादत) करना अथवा उससे सम्बंधित कार्यों में शामिल होना.

मेरे विचार से आपको किसी आलिम (इस्लामिक विद्वान) से सलाह लेने की आवश्यकता है. आशा है सलाह पर गौर करोगे.





सलीम भाई, इस विषय से सम्बंधित "हमारी अंजुमन" पर मेरा लेख अवश्य पढ़ें:

गैर-मुसलमानों के साथ संबंधों के लिए इस्लाम के अनुसार दिशानिर्देश
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दिखावे के लिए क्यों गंवाना चाहते हैं "वन्दे मातरम"?

तारकेश्वर जी आपने यह बात सही लिखी है की केवल बोल देने से कुछ नहीं होता है, बेशक केवल बोल देने से कुछ नहीं होता है, लेकिन आप केवल बोल देने के लिए ही क्यों "वन्दे मातरम" गंवाना चाहते हैं? बहुत से मुसलमान इसी सोच को ध्यान में रखते हुए वन्दे मातरम बोलते हैं. लेकिन क्या केवल दिखाने के लिए इसे गाना धौखा नहीं है? आप जिसकी पूजा करते हैं, उनकी मैं इज्ज़त करूँ यह बात तो समझ में आती है, लेकिन जिनकी मैं पूजा नहीं करता, केवल अपने मित्रों को दिखाने अथवा महान कहलवाने के लिए दिखावे उनकी पूजा क्या सही कहलाई जा सकती है?

वैसे इस बहाने इस पर चर्चा की जाए तो यह एक अच्छा प्रयास कहा जाएगा. विचारों के आदान प्रदान से ही एक-दुसरे को समझने तथा एक-दुसरे के नजरिया को जानने का मौका मिलता है. मेरा यह विचार है कि किसी भी मुद्दे पर केवल अपनी सोच के हिसाब से धारणा बनाने की जगह जिन्हें ऐतराज़ है उनके नज़रिए से भी मुद्दे को देखना चाहिए. क्योंकि एक ही नज़रिए से देखने से किसी भी मसले का हल मुश्किल होता है.

'वन्दे मातरम' पर जो मुस्लिम समुदाय को जो एतराज़ है, उसमे सबसे पहली बात तो 'वन्दे' अर्थात 'वंदना' शब्द के अर्थ पर है. अक्सर इसका अर्थ 'पूजा' लगाया जाता है और आप सभी को यह पता होगा कि केवल एक ईश्वर की ही पूजा करने का नाम "इस्लाम" है यहाँ तक कि ईश्वर को छोड़ कर किसी और को पूज्य मानने वाला शख्स मुसलमान हो ही नहीं सकता है। इस्लाम के कलिमे "ला-इलाहा इलल्लाह" का मतलब ही यही है कि "नहीं है कोई पूज्य सिवा अल्लाह के"।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ईश्वर के अलावा किसी और की प्रंशंसा भी नहीं की जा सकती है या प्रेम नहीं किया जा सकता. बेशक किसी भी अच्छी चीज़ की प्रशंसा करना अथवा प्रेम करना किसी भी धर्म में अपराध नहीं होता है. इससे पता चलता है कि मुसलमान धरती माँ की प्रशंसा तो कर सकते हैं, उससे अपार प्रेम तो कर सकते हैं लेकिन पूजा नहीं.
तो क्या किसी को उसके ईश के अलावा किसी और की पूजा करने के लिए बाध्य करना तर्क-सांगत कहलाया जा सकता है?

वैसे एक कटु सत्य यह भी है कि वन्देमातरम गाने भर से कोई देशप्रेमी नहीं होता है और देश के गद्दार वन्देमातरम गाकर देशप्रेमी नहीं बन सकते हैं. बंधू, आप मुसलमानों से क्या चाहते हैं? देश प्रेम या फिर वन्देमातरम? देश से प्यार देश की पूजा नहीं हो सकती है, और न ही देश की पूजा-अर्चना का मतलब देश से प्यार हो सकता है. हम अपनी माँ से प्यार करते हैं, परन्तु उस प्रेम को दर्शाने के लिए उनकी पूजा नहीं करते हैं. यह हमारी श्रद्धा नहीं है कि हम ईश्वर के सिवा किसी और को नमन करें, यहाँ तक कि माँ को भी नमन नहीं कर सकते हैं. जब कि ईश्वर ने पवित्र कुरआन में कहा है कि अगर वह मनुष्यों में से किसी को नमन करने की अनुमति देता तो वह पुत्र के लिए अपनी माँ और पत्नी के लिए अपने पति को नमन करने की अनुमति देता. ईश्वर की पूजा ईश्वर के लिए ही विशिष्ट है और ईश्वर के सिवा किसी को भी इस विशिष्टता के साथ साझा नहीं किया जा सकता हैं, न ही अपने शब्दों से और न कामों से.

भारत वर्ष को अपना देश मानने के लिए मुझे कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती है 'वन्देमातरम' जैसे किसी गीत को गाने की. यह मेरा देश है क्योंकि मैं इसको प्रेम करता हूँ, यहाँ पैदा हुआ हूँ, और इसके कण-कण मेरी जीवन की यादें बसी हुई हैं. इसके दुश्मन के दांत खट्टे करने की मुझमे हिम्मत एवं जज्बा है. इसकी कामयाबी के गीत मैं गाता हूँ एवं पुरे तौर पर प्रयास भी करता हूँ. चाहे कोई मुझे गद्दार कहे, या मेरे समुदाय को गद्दार कहे, उससे मुझे कोई फरक नहीं पड़ता. क्योंकि यह मेरा देश है और किसी के कहने भर से कोई इसे मुझसे छीन नहीं सकता है.

रही बात उलेमा अर्थात (इस्लामिक शास्त्री) के द्वारा 'वन्दे मातरम' के खिलाफ फतवे की, तो यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि उलेमाओं का कार्य किसी भी प्रश्न पर इस्लाम के एतबार से सलाह देना है. और जब भी किसी क़ानूनी सलाह देने वाले से सलाह मांगी जाती है तो यह उसका फ़र्ज़ बनता है कि वह जिस परिप्रेक्ष में सलाह मांगी गई है, उसमें सही स्थिति के अनुसार उचित क़ानूनी सलाह दे. कोई भी उलेमा अपनी मर्ज़ी के एतबार से फतवा (अर्थात इस्लामिक कानूनों के हिसाब से सलाह) दे ही नहीं सकता है. और जितनी बार भी किसी मुद्दे पर प्रश्न किया जाता है तो उनका फ़र्ज़ है कि उतनी बार ही वह उक्त मुद्दे पर उचित सलाह (अर्थात फतवा) दें. वैसे उलेमा का कार्य सिर्फ शिक्षण देना भर है. उनको मानना या मानना इंसान की इच्छा है. अगर कोई उलेमा इसलाम की आत्मा के विरूद्व कुछ भी कहता है, तो उसकी बात का पालन करना भी धर्म विरुद्ध है.


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अच्छे कार्यो का स्वर्ग में क्या बदला मिलेगा?

अधिक अच्छी बात तो यह है कि अच्छे कार्यों के बदले में स्वर्ग की इच्छा की जगह ईश्वर को पाना ही मकसद होना चाहिए. जिसने स्वयं ईश्वर को पा लिया उसने सब कुछ पा लिया. यह बिलकुल ऐसा ही है जैसे कि (उदहारण स्वरुप) एक राजा ने अपनी प्रजा में ऐलान किया कि बाज़ार सजाया जा रहा है, उसमें से कोई भी कुछ भी मुफ्त में ले सकता है. बस फिर क्या था, सब कुछ न कुछ लेने लगे. तभी एक महिला आई और उसने महाराज पर अपना हाथ रख दिया. सही भी है, जिसे राजा मिल गया उसे सभी कुछ मिल गया.

इसमें एक बात तो यह है कि परलोक में अच्छे कार्यों के बदले में जो मिलेगा वह ईश्वर का अहसान होगा, हमारा हक नहीं. और वहां सब उसके अहसान मंद होंगे, जैसे कि इसी धरती पर मनुष्यों को छोड़कर बाकी दूसरी जीव होते हैं.अक्सर सभी धर्मों के लोग परलोक की तुलना पृथ्वी लोक से करते हैं. अब क्योंकि मनुष्यों ने केवल पृथ्वी लोक के ही दर्शन किये हैं इसलिए इस लोक के ही उदहारण दिए जाते हैं, ताकि बात के महत्त्व को समझा जा सके. इस विषय में यह बात बहुत अहम् है कि परलोक का विधान अलग है इसलिए व्यवस्था भी अलग होगी. वहां किसी वस्तु की आवश्यकता इस धरती की तरह नहीं होगी, जैसे कि यहाँ जीवित रहने के लिए भोजन, जल एवं वायु की आवश्यकता होती है. ईश्वर कुरआन में कहता है कि (अर्थ की व्याख्या) उसने वहां का बंदोबस्त ऐसा किया है जिसको किसी आँख ने देखा नहीं होगा तथा जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं होगा. अर्थात परलोक की व्यवस्था हमारी सोच की पहुँच से बहुत दूर की बात है.

ईश्वर परलोक के बारे में कहता है कि:

और वहां तुम्हारे लिए वह सब कुछ होगा, जिसकी इच्छा तुम्हारे मन को होगी. और वहां तुम्हारे लिए वह सब कुछ होगा, जिसकी तुम मांग करोगे. [41:31-32]


पवित्र पैग़म्बर मुहम्मद (स.) ने फ़रमाया कि, "अल्लाह कहता है कि, मैंने अपने मानने वालो के लिए ऐसा बदला तैयार किया है जो किसी आँख ने देखा नहीं और कान ने सुना नहीं है. यहाँ तक कि इंसान का दिल कल्पना भी नहीं कर सकता है." (बुखारी 59:8)


पवित्र कुरआन भी ऐसे ही शब्दों में कहता है:

और कोई नहीं जानता है कि उनकी आँख की ताज़गी के लिए क्या छिपा हुआ है, जो कुछ अच्छे कार्य उन्होंने किएँ है यह उसका पुरस्कार है. (सुरा: अस-सज्दाह, 32:17)

स्वर्ग (जन्नत) के ईनाम महिलाओं और पुरुषों के लिए बराबर होंगे:
दूसरी बात यह है कि पृथ्वी की ही तरह स्वर्ग के ईनाम भी महिलाओं और पुरुषों के लिए एक जैसे हैं. वहाँ लिंग के आधार पर थोड़ा सा भी भेदभाव नहीं होगा. यह बात सुरा: अल-अह्जाब से स्पष्ट है:

मुस्लिम पुरुष और मुस्लिम स्त्रियाँ, ईमानवाले पुरुष और ईमानवाली स्त्रियाँ, निष्ठापूर्वक आज्ञापालन करने वाले पुरुष और आज्ञापालन करने वाली स्त्रियाँ, सत्यवादी पुरुष और सत्यवादी स्त्रियाँ, धैर्यवान पुरुष और धरी रखने वाली स्त्रियाँ, विनर्मता दिखाने वाले पुरुष और विनर्मता दिखाने वाली स्त्रियाँ, सदका (दान) देने वाले पुरुष और सदका देने वाली स्त्रियाँ, रोज़ा रखने वाले पुरुष और रोज़ा रखने वाली स्त्रियाँ, अपने गुप्तांगों की रक्षा करने वाले पुरुष और रक्षा करने वाली स्त्रियाँ और अल्लाह को अधिक याद करने वाले पुरुष और यद् करने वाली स्त्रियाँ - इनके लिए अल्लाह ने क्षमा और बड़ा प्रतिदान तैयार कर रखा है. [सुर: अल-अहज़ाब, 33:35]

दोनों को उसने ही बनाया है इसलिए वह दोनों का उनकी जरूरतों और इच्छाओं के अनुसार ध्यान रखेगा. अगर हम ईश्वर को प्राप्त करने के मकसद से कार्य करेंगे तो उसका वादा है की वह हमारी संतुष्टि के लिए इंतजाम करेगा.

क्या स्वर्ग में ७२ पत्नियाँ अथवा हूर मिलेंगी?

इसमें पहली बात तो यह कि "हूर" का मतलब संगी-साथी से है, जो कि महिला तथा पुरुष दोनों हो सकते इसमें कुछ लोग हूर नामक स्त्री साथी से विवाह करने का इच्छुक भी हो सकते हूर" अथवा "अप्सरा" पर विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें: शोभायमान आँखों वाली हूर!

बात अगर एक से अधिक पत्नी के अधिकार की करें तो चाहे पृथ्वी हो अथवा स्वर्ग, बहु विवाह विशेषाधिकार नहीं बल्कि विशेष परिस्थितियों में समाधान भर है. जैसा कि आप को अच्छी तरह से पता होगा कि प्रत्येक कानून में कुछ अपवाद भी होते हैं, और अपवाद कभी भी सिद्धांत नहीं कहलाए जा जाते हैं. कोई भी किसी देश के कानून के बारे में अपवाद को देखकर राय नहीं बना सकता है. अगर दुसरे शब्दों में कहें तो इस्लाम बहुविवाह के दरवाज़े सभी पुरुषों के लिए नहीं खोलता है.

इसका आसान सा मतलब यह है कि यह सुविधा केवल उन्ही लोगों के लिए होगी जो ऐसा चाहते हों. क्योंकि स्वयं ईश्वर ने वादा किया है कि महिलाऐं और पुरुष जो भी चाहेंगे, वह सबकुछ उन्हें मिलेगा. इसमें यह बात भी ध्यान देने वाली है वहां इस बात को कुबूल करने अथवा इंकार करने की विवशता नहीं होगी.


- शाहनवाज़ सिद्दीकी
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बी एन शर्मा जी (भंडाफोडू) के सवालों का जवाब

बी एन शर्मा जी, आपने लिखा कि अल्लाह के इतना करीब होते हुए भी उसने मुहम्मद (स.) को केवल एक ही लड़का दिया और वह भी कुछ समय बाद मृत्यु को प्राप्त हो गया.

शर्मा जी, क्या ईश्वर के करीब होने और लड़का ना होने का कोई ताल्लुक है? क्या आपकी सोच यह है कि लड़का होना इतनी अच्छी बात है कि जो ईश्वर के करीब होगा उसके घर में लड़कों की भरमार होगी और जो ईश्वर से दूर होगा उसे ईश्वर लड़कियां देगा? आपकी इस सोच पर मुझे गुस्सा नहीं अपितु दया आ रही है. वैसे आपको बताता चलूँ कि मेरे खुदा ने मुझे (माशाल्लाह) दो-दो प्यारी-प्यारी बेटियां दी हैं और यह उस परम-परमेश्वर का मुझपर एहसान है.

आपने मुहम्मद (स.) के वंशजो पर दु:ख की और उनके शहीद होने पर सवाल उठाया, क्योंकि आपका मानना है कि अच्छे लोगों को दुःख नहीं मिलते जबकि हमारा मानना है कि ईश्वर हमेशा अच्छे लोगों को ही दुःख देखर उनकी परीक्षा लेता है कि वह इस हाल में भी ईश्वर का शुक्र अता करते हैं कि नहीं. वैसे परीक्षा उसी की ली जाती है जो इस काबिल होता है और दुःख: झेलकर भी ईश्वर का शुक्र अता करने वाले विरले ही होते हैं. और ऐसे ही विरलों का ज़िक्र आपने अपने लेख में किया है, जिसपर मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ.

आप जानना चाहते हैं कि ईश्वर ने अपने रसूल (संदेशवाहक) के वंशजो को शहीद होने से क्यों नहीं बचाया? आपके कहने का मतलब शायद यह है कि अगर कोई परम गुरु मुहम्मद (स.) जैसे महापुरुष के परिवार का सदस्य या उनका वंशज है तो ईश्वर को उनके लिए पृथ्वी के नियम बदल देने चाहिए? जबकि स्वयं ईश्वर कहता है कि वह मनुष्य पर नहीं अपितु उसके कार्यों पर नज़र डालकर फैसला करता है. रही बात युद्ध में मदद की तो उस ज़माने में ही नहीं बल्कि आज भी ईश्वर सत्य के साथ होता है. और अपने लोगों और अपनी धरती की रक्षा करने वालों की मदद करता है. शायद तुम्हे याद नहीं कि उसकी मदद से ही हमने पाकिस्तान को 4 बार युद्ध के मैदान में धुल चटाई है.

शर्मा जी, आपकी यह बात बिलकुल सही है कि किसी दुसरे मज़हब को मानने वाले अथवा शायरी करने वाले नर्क के वासी नहीं हो सकते हैं. नर्क में जाने का यह कोई कारण है ही नहीं, बल्कि ईश्वर ने कुरआन में कहा कि हमेशा हक का साथ दो चाहे हक बात कोई तुम्हारा दुश्मन ही क्यों ना करे. फिर शायरी तो बड़े-बड़े दीनदार लोगो ने की हैं. आपसे किसने कह दिया कि वह दोजखी हो जाएगा? हाँ अगर कोई ईश्वर अथवा उसके विधान की खुलेआम शब्दों अथवा शायरी के द्वारा खिलाफत करे और मौत तक उसको अपनी गलतियों का पछतावा ना हो तो अवश्य हो सकता है.

आपकी शिकायत है कि मुसलमान मुहम्मद (स.) के वंशजो के कातिलों को रज़िअल्लाहू कह कर आदर करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है, जिन पर यह बात साबित है उनका आदार नहीं किया जाता है, बल्कि उन पर लानत भेजी जाती है, जैसा की यजीद. रही बात 'रज़िअल्लाहू' कहने की, तो ऐसा मुहम्मद (स.) के उन साथियों को कहा जाता है जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में ईश्वर के आखिरी संदेशवाहक और मेरे परम गुरु मुहम्मद (स.) को ईमान की हालत में देखा और ईमान की हालत में ही मौत हो गई. अब आप ही बताइए किसी को कैसे पता कि किसकी मौत ईमान की हालत में हुई और किसकी नहीं? यह तो केवल ईश्वर ही जानता है. रही बात इमान की तो अगर किसी ने पूरी दुनिया के इंसानों को भी एक साथ क़त्ल किया हो, तथा उसे अपनी ज़िन्दगी में ही अपनी गलती का एहसास हो गया हो और उसने ईश्वर से अपनी गलतियों की माफ़ी मांग ली हो तो ईश्वर रहीम है और उसका वादा है कि वह उसके गुनाह को माफ़ कर देगा. हाँ यह बात अवश्य है कि जिन लोग के हक को मारा अर्थात जिनको क़त्ल किया वह लोग चाहेंगे तो अवश्य ही अपना हक अल्लाह (ईश्वर) की बारगाह में इन्साफ के दिन मांग ले लेंगे. अर्थात दुनिया में एक-दुसरे के हक माफ़ नहीं होंगे.

मसलन अगर किसी ने किसी से पैसे उधार लिए और नहीं लौटाए तो इन्साफ के दिन उसके बदले में उसे अपने सद्कर्म पैसे के बदले में देने होंगे. इसमें भी अगर उसको दुनिया में ही अपनी गलती का एहसास होगा गया लेकिन पैसे लौटने के लिए उसके पास बचे नहीं तो वह जिससे पैसे उधर लिए थे उससे वह पैसे माफ़ करने की बार-बार गुज़ारिश कर सकता है. और अगर उसने ऐसा किया और पैसे ना होने की वजह से नहीं लौटा पाया तो इन्साफ के दिन ईश्वर स्वयं अपनी तरफ से उधार देने वाले के दफ्तर में पैसे के बदले अच्छाइयां भर देगा.

- शाहनवाज़ सिद्दीकी
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आत्मा क्या है?

सबसे पहले, हमें 'जीवन' और आत्मा (रूह) का भेद पता करना पड़ेगा। जीवन एक शक्ति है जो प्राणी को रहने के विभिन्न भागों में कार्य करने के योग्य बनाता है। जब तक शरीर में ''जीवन" (अर्थात ऊर्जा है), विभिन्न भाग काम कर सकते हैं। जब शरीर, ऊर्जा (अर्थात जीवन) को खो देता है (एक बैटरी की शक्ति की तरह), उसके सभी भाग कार्य करना बंद कर देते हैं, तब उसका शरीर मृत हो जाता है। मृत्यु का होना ऊर्जा का अभाव है, जिसके बिना शरीर कार्य नहीं कर सकता हैं। सभी प्राणियों (पशुओं और पौधों) को 'जीवन' या ऊर्जा प्राप्त है, जब तक कि उन में जीवन, ऊर्जा की अभिव्यक्ति के रूप में है। कुरआन की आयत (श्लोक) 15:29, 32:9 और 38:72 में निर्दिष्ट है कि रूह जीवन से अलग है।

[15:29] तो तब मैं उसे पूरा बना चुकुं और उसमें अपनी रूह (आत्मा) फुक दूँ तो तुम उसके आगे सजदे में गिर जाना!"

[32:9] फिर उसे ठीक-ठाक कर दिया और उसमें अपनी रूह (आत्मा) फूंकी. और तुम्हे कान और आँखे और दिल दिए. तुम आभारी थोड़े ही होते हो।

[38:72] तो जब मैं उसको ठीक-ठाक कर दूँ और उसमें अपनी रूह (आत्मा) फूँक दूँ, तो तुम उसके आगे सजदे में गिर जाना।"


आत्मा की विशेषता की वजह से फरिश्तो को हुक्म हुआ था कि वह आदम को सजदा करें। आदम के अलावा फ़रिश्ते सिर्फ अल्लाह को सजदा करते हैं - [16:49] और आकाशों और धरती में जितने भी जीवधारी हैं वे सब अल्लाह ही को सजदा करते हैं और फ़रिश्ते भी और वे घमंड बिलकुल नहीं करते। इससे पता चलता है कि आत्मा, ईश्वर के एक गुण का सार है, जब मनुष्य में साँस आई तो उसे फरिश्तो की श्रद्धा के योग्य बना दिया।

इसको ऐसे भी समझ सकते हैं, कि 'रूह' एक 'सॉफ्टवेयर' की तरह है, हम इसके प्रदर्शन को देख तो कर सकते हैं या अनुभव तो कर सकते हैं लेकिन शरीर (अर्थात हार्डवेयर) की तरह छू नहीं सकते।

- शाहनवाज़ सिद्दीकी
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अधिकतर मान्यताओं के अनुसार इस्लाम में संगीत हराम है

अपने ब्लॉग महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर (Suresh Chiplunkar) जी ने एक लेख लिखा जो कि गुजरात के भरूच जिले में चल रहे एक रहत शिविर पर आधारित था.

"अरे?!!!… मोदी के गुजरात में ऐसा भी होता है? ...... Gujrat Riots, Relief Camp and NGOs in India"

जिस पर मेरा कमेंट्स था कि :
"चिपलूनकर साहब, संगीत इस्लाम में हराम है और अगर इस्लामिक शरियत के हिसाब से इकट्ठे लोगो के खून पसीने से कमाए हुए पैसे से किसी की मदद की जाती है तो क्या उस पैसे का प्रयोग ग़ैर-इस्लामी तरीके से हो सकता है? मैं स्वयं भी ज़कात देता हूँ, लेकिन कभी भी ऐसी जगह ज़कात नहीं दे सकता हूँ जहाँ ग़ैर-इस्लामी कार्य होते हों. वैसे मैं तो हमेशा शिक्षण संस्थानों में ही अपनी ज़कात देता हूँ.



हाँ ज़बरदस्ती टोपी पहनना या दाढ़ी रखवाने बिलकुल ही गलत कार्य है, इसकी निंदा अवश्य ही होनी चाहिए. क्योंकि ऐसे कार्य मनुष्य और प्रभु के प्रेम पर आधारित होते हैं, इस तरह के कार्यों पर ज़बरदस्ती की इजाज़त शरियत कानून में भी नहीं होती है. ऐसा कानून शरियत का नहीं अपितु तालिबान का ही हो सकता है.

और रही शरियत कानून की बात तो मुसलमान शरियत के तहत ही अपनी ज़िन्दगी बसर करते हैं. बार-बार क्यों यह बात लिख कर कि इन पर शरियत कानून लागु कर दो, आप लोग शरियत कानून का हौव्वा खड़ा करते हैं?
हमने तो स्वयं अपने ऊपर शरियत कानून लागु कर रखा है. क्या आपको पता भी है कि शरियत कानून क्या है? या सिर्फ तालिबानी कानूनों को शरियत कानून मान कर बैठे हैं?
 
इस पर सुरेश जी ने दो प्रश्न लिखे:
@ शाहनवाज़ - आपने कहा कि
1) "संगीत इस्लाम में हराम है"

इसे साबित करने के लिये हदीस या कुरान का कोई पैराग्राफ़ बतायें, कि इस्लाम में संगीत क्यों हराम है?, कैसे हराम है? इन बातों की डीटेल्स, मोहम्मद रफ़ी, नौशाद से लेकर एआर रहमान तक सभी मुस्लिम संगीतकारों-गायकों को ध्यान में रखकर दीजिये… या तो यहाँ टिप्पणी करके मेरा (सबका) ज्ञान बढ़ाईये या आपकी अंजुमन पर एक विस्तृत पोस्ट लिखिये…।


2) आपने कहा कि - "रही शरियत कानून की बात तो मुसलमान शरियत के तहत ही अपनी ज़िन्दगी बसर करते हैं"

 
क्या दाऊद इब्राहीम, अबू सलेम, अब्दुल करीम तेलगी, अजमल कसाब और अफ़ज़ल गुरु भी शरीयत के अनुसार जीवन-यापन करते हैं? यदि हां तो कैसे और यदि नहीं, तो इन लोगों पर शरीयत के अनुसार सजा मुकर्रर की जाये, क्या आप सहमत हैं?


मेरे उपरोक्त दोनो "नादान" सवालों के जवाब अवश्य दीजियेगा, आपको न पता हों तो अपने "गुरुजी" से पूछकर ही दीजियेगा, लेकिन पूरे विस्तार से दीजियेगा, ताकि हमें भी तो पता चले।


इसमें पहली बात तो यह कि गाना इस्लाम में प्रतिबंधित नहीं है, मुसलमान ना`त (मुहम्मद स. की तारीफ़) इत्यादि जैसे गीत गाते हैं. लेकिन कई प्रकार के संगीत है जो कुरान और हदीस (मुहम्मद स. की बताई हुई बातें) के द्वारा निषिद्ध है, जैसे कि मनोरंजन के लिए बजने वाला संगीत. लेकिन "सभी प्रकार के संगीत निषिद्ध हैं" इस विषय पर इस्लामिक विद्वानों की अलग-अलग राय हैं. इसलिए इस विषय पर बहस करना अनुचित है.

शैख़-अल-इस्लाम इब्न-तय्मियाह (रह.) ने फ़रमाया: "चारों इमामों (सुन्नी इमाम) का नजरिया संगीत के प्रति यह है कि हर तरह के संगीत का यंत्र हराम है. किसी भी इमाम अथवा उनके शिष्यों में संगीत से सम्बंधित मामले में कोई विरोधाभास नहीं है." (अल-मजमू, 11/576).

अल-अल्बानी (रह.) ने फ़रमाया: "इस्लाम के चारों मज़हब इस बात पर सहमत हैं, कि संगीत का सारे यंत्र हराम हैं. (अल-सहीहः, 1/145).
 
उपरोक्त उदहारण से यह पता चलता है कि इस्लाम में अधिकतर लोग संगीत को हराम (निषिद्ध) मानते हैं. परन्तु कौन क्या मानता है, यह आस्था का प्रश्न है. आप किसी को भी अच्छी बातें बता तो सकते हैं, परन्तु वह माने अथवा नहीं इसका फैसला तो उक्त व्यक्ति पर ही निर्भर होना चाहिए. मेरा धर्म किसी पर भी ज़बरदस्ती की इजाज़त नहीं देता है. क्योंकि धर्म का रिश्ता आस्था से है और आस्था पर केवल और केवल ह्रदय का ही वश चलता है.

अगर कोई यह मानता है कि इस्लाम में संगीत हराम है, तो वह अपने खून-पसीने की कमाई में से दी गई ज़कात को ऐसे कार्यों अथवा ऐसी जगह पर लगते हुए नहीं देख सकता है, जहाँ संगीत के प्रयोग जैसे बड़े धार्मिक नियमों का उल्लंघन होता हो.  इसमें एक बात और महत्वपूर्ण है, कि ज़कात और मदद में फर्क होता है. मदद की कोई कम या अधिक सीमा नहीं होती है, जबकि ज़कात अर्थात अपनी बचत में से 2.5 प्रतिशत देना हर एक के लिए आवश्यक होता है. जहाँ मदद किसी को भी कुछ भी देखे बिना दी जा सकती है, वहीँ ज़कात पूरी तरह छान-बीन करके ही दी जाती है, कि वह सही और आवश्यकता की जगह पहुँच रही है अथवा नहीं. इसमें यह भी देखना आवश्यक होता है कि जो व्यक्ति ज़कात मांग रहा है वह इसका हक़दार है भी अथवा नहीं, कहीं ऐसा तो नहीं कि वह खुद अपनी आजीविका चलाने का सामर्थ्य रखता हो तथा जो सामर्थ्य नहीं रखते उनका हक मार रहा हो. ऐसा पाए जाने पर उतने हिस्से की ज़कात दुबारा दिया जाना आवश्यक है.

अब ऐसे में ज़कात के पैसे से चलने वाले किसी 'शिविर' में अगर कोई व्यक्ति किसी प्रतिबंधित कार्य को करता है तो यह बिलकुल ऐसा है जैसे कोई मांसाहार को अनुचित समझने वाला व्यक्ति गरीब लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करे और भोजन ग्रहण करने वाले लोग मांसाहार की मांग करें और कहें कि हमारे देश में मांसाहार की इजाज़त है. तो क्या उनकी मांग उचित होगी???

रही बात मौहम्मद रफ़ी अथवा ए. आर. रहमान अथवा इन जैसे गायकों अथवा संगीतकारों की तो में किसी भी मनुष्य के ऊपर उसके कार्यों के द्वारा कमेंट्स नहीं कर सकता हूँ. वैसे भी केवल संगीत का प्रयोग करने भर से कोई इस्लाम से बाहर नहीं हो जाता है. इस्लाम से बाहर केवल वही हो सकता है जो कि ईश्वर को ना माने एवं उसके आदेशो को अपनी अक्ल से गलत ठहराए. और यह भी आवश्यक नहीं कि इंसान खुले-आम ईश्वर को मानने का ऐलान करे. इसलिए दुनिया में कौन काफिर है, यह तो केवल ईश्वर ही जानता है. इसलिए कुरआन में उसने दूसरों को काफ़िर बोलने से मना फ़रमाया है.

लेकिन किसी भी धार्मिक संस्था को उसके धर्म के अनुरूप राहत शिविर चलाने कि आज्ञा अवश्य होनी चाहिए. मेरा एक मित्र पास के ही एक वैदिक आश्रम में योग शिविर में हिस्सा लेने के लिए गया, परन्तु वहां उसको एक फॉर्म दिया गया जिसमें लिखा था कि वह अपनी इच्छा से 'ॐ' शब्द का उच्चारण तथा सूर्य नमस्कार करेगा, जिस पर उसको एतराज़ हुआ. हालाँकि उपरोक्त आश्रम को हमारी सरकार से भी अनुदान मिलता है, फिर भी मेरी उस मित्र को सलाह यही थी, कि उक्त आश्रम को अपने धर्म के हिसाब से 'योग शिविर' चलने का पूरा हक है. अगर तुम्हे उसके नियम पसंद नहीं आते हैं, तो उसमे हिस्सा लेने की कोई आवश्यकता नहीं है, परन्तु उसका विरोध करना अनुचित है.

फिर सबसे बड़ी बात तो यह है, कि जिस लोगो का आपने ज़िक्र किया वह एक शरणार्थी शिविर में रह रहे हैं, जहाँ पैसे की कमी की वजह से बहुत सी आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध नहीं होंगी. ऐसे में अपने थोड़े से पैसो को जीवन के लिए बहुत सी आवश्यक वस्तुओं पर खर्च करने की जगह टी.वी. जैसी वस्तुओं पर खर्च करना कोई अक्लमंदी का काम नहीं है. पैसे को बचा कर जल्द से जल्द ऐसे शिविरों की जगह अपने स्वयं के खर्च से अपने रहने का इंतजाम करना क्या अधिक अकलमंदी का कार्य नहीं है?

बात अगर दाऊद इब्राहीम, अबू सलेम, अब्दुल करीम तेलगी, अजमल कसाब और अफ़ज़ल गुरु जैसे अपराधियों एवं मानवता के दुश्मनों के बारे में की जाए है तो इनको अवश्य ही सख्त से सख्त सजा होनी चाहिए. अगर यह शरियत के तहत ज़िन्दगी बसर करते तो यह इतने जघंन्य अपराध करते ही नहीं. माननिये सुरेश जी, कृपया करके तालिबानी कानूनों को शरियत का कानून मानने की गलती नहीं करें.

अंत में एक बात कहना अति-आवश्यक है, सुरेश जी मेरे प्यारे वतन के निवासी होने के नाते मेरे भाई हैं तथा मुझसे बड़े होने के नाते उनकी इज्ज़त करना मेरा धर्म है. इसलिए अगर कहीं भी, कुछ भी गलत लिख दिया हो तो क्षमा का प्रार्थी हूँ और चाहता हूँ कि वह अवश्य ही मेरी गलती को मेरे संज्ञान में लाएं.

-शाहनवाज़ सिद्दीकी
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