Showing posts with label Islam. Show all posts
Showing posts with label Islam. Show all posts

दया और न्याय का स्थान

मुसलमानों के लिए यह ज़रूरी है कि वह जान और मान लें कि इस्लाम दया और न्याय का धर्म है. इस्लाम के लिए इस्लाम के अलावा अगर कोई और शब्द इसकी पूरी व्याख्या कर सकता है तो वह "न्याय" है.

किसी पर झूठा इलज़ाम लगाना या झूठा इलज़ाम लगाने वालों का साथ देना, जब तक किसी पर जुर्म साबित ना हो जाए, (मतलब जुर्म की सच्ची गवाही ना मिल जाए) उसे मुजरिम ठहराना अथवा जुर्म साबित किये बिना ही सज़ा देना, सजा देने की मांग करना ...या सजा देने की पैरवी करना अन्याय और अत्याचार है।

... निसंदेह अत्याचारी कभी सफल नहीं हो सकते [कुरआन 6:21]

... निश्चय ही वह अत्याचारियों को पसंद नहीं करता [42:40]

... जो लोगो पर ज़ुल्म करते हैं और नाहक ज्यादतियां करते हैं। ऐसे लोगों के लिए दुखद यातना है। [42:42]

किन्तु जिसने धैर्य से काम लिया और क्षमा कर दिया वह उन कामों में से हैं जो (सफलता के लिए) आवश्यक ठहरा दिए गए हैं। [42:43]

और मुझे तुम्हारे साथ न्याय का हुक्म है.... [कुरआन 42:15]

और यह बस्तियां वह हैं जिन्होंने अत्याचार किया और हमने उन्हें विनष्ट कर दिया.... [18:59]
Read More...

अधिकतर मान्यताओं के अनुसार इस्लाम में संगीत हराम है

अपने ब्लॉग महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर (Suresh Chiplunkar) जी ने एक लेख लिखा जो कि गुजरात के भरूच जिले में चल रहे एक रहत शिविर पर आधारित था.

"अरे?!!!… मोदी के गुजरात में ऐसा भी होता है? ...... Gujrat Riots, Relief Camp and NGOs in India"

जिस पर मेरा कमेंट्स था कि :
"चिपलूनकर साहब, संगीत इस्लाम में हराम है और अगर इस्लामिक शरियत के हिसाब से इकट्ठे लोगो के खून पसीने से कमाए हुए पैसे से किसी की मदद की जाती है तो क्या उस पैसे का प्रयोग ग़ैर-इस्लामी तरीके से हो सकता है? मैं स्वयं भी ज़कात देता हूँ, लेकिन कभी भी ऐसी जगह ज़कात नहीं दे सकता हूँ जहाँ ग़ैर-इस्लामी कार्य होते हों. वैसे मैं तो हमेशा शिक्षण संस्थानों में ही अपनी ज़कात देता हूँ.



हाँ ज़बरदस्ती टोपी पहनना या दाढ़ी रखवाने बिलकुल ही गलत कार्य है, इसकी निंदा अवश्य ही होनी चाहिए. क्योंकि ऐसे कार्य मनुष्य और प्रभु के प्रेम पर आधारित होते हैं, इस तरह के कार्यों पर ज़बरदस्ती की इजाज़त शरियत कानून में भी नहीं होती है. ऐसा कानून शरियत का नहीं अपितु तालिबान का ही हो सकता है.

और रही शरियत कानून की बात तो मुसलमान शरियत के तहत ही अपनी ज़िन्दगी बसर करते हैं. बार-बार क्यों यह बात लिख कर कि इन पर शरियत कानून लागु कर दो, आप लोग शरियत कानून का हौव्वा खड़ा करते हैं?
हमने तो स्वयं अपने ऊपर शरियत कानून लागु कर रखा है. क्या आपको पता भी है कि शरियत कानून क्या है? या सिर्फ तालिबानी कानूनों को शरियत कानून मान कर बैठे हैं?
 
इस पर सुरेश जी ने दो प्रश्न लिखे:
@ शाहनवाज़ - आपने कहा कि
1) "संगीत इस्लाम में हराम है"

इसे साबित करने के लिये हदीस या कुरान का कोई पैराग्राफ़ बतायें, कि इस्लाम में संगीत क्यों हराम है?, कैसे हराम है? इन बातों की डीटेल्स, मोहम्मद रफ़ी, नौशाद से लेकर एआर रहमान तक सभी मुस्लिम संगीतकारों-गायकों को ध्यान में रखकर दीजिये… या तो यहाँ टिप्पणी करके मेरा (सबका) ज्ञान बढ़ाईये या आपकी अंजुमन पर एक विस्तृत पोस्ट लिखिये…।


2) आपने कहा कि - "रही शरियत कानून की बात तो मुसलमान शरियत के तहत ही अपनी ज़िन्दगी बसर करते हैं"

 
क्या दाऊद इब्राहीम, अबू सलेम, अब्दुल करीम तेलगी, अजमल कसाब और अफ़ज़ल गुरु भी शरीयत के अनुसार जीवन-यापन करते हैं? यदि हां तो कैसे और यदि नहीं, तो इन लोगों पर शरीयत के अनुसार सजा मुकर्रर की जाये, क्या आप सहमत हैं?


मेरे उपरोक्त दोनो "नादान" सवालों के जवाब अवश्य दीजियेगा, आपको न पता हों तो अपने "गुरुजी" से पूछकर ही दीजियेगा, लेकिन पूरे विस्तार से दीजियेगा, ताकि हमें भी तो पता चले।


इसमें पहली बात तो यह कि गाना इस्लाम में प्रतिबंधित नहीं है, मुसलमान ना`त (मुहम्मद स. की तारीफ़) इत्यादि जैसे गीत गाते हैं. लेकिन कई प्रकार के संगीत है जो कुरान और हदीस (मुहम्मद स. की बताई हुई बातें) के द्वारा निषिद्ध है, जैसे कि मनोरंजन के लिए बजने वाला संगीत. लेकिन "सभी प्रकार के संगीत निषिद्ध हैं" इस विषय पर इस्लामिक विद्वानों की अलग-अलग राय हैं. इसलिए इस विषय पर बहस करना अनुचित है.

शैख़-अल-इस्लाम इब्न-तय्मियाह (रह.) ने फ़रमाया: "चारों इमामों (सुन्नी इमाम) का नजरिया संगीत के प्रति यह है कि हर तरह के संगीत का यंत्र हराम है. किसी भी इमाम अथवा उनके शिष्यों में संगीत से सम्बंधित मामले में कोई विरोधाभास नहीं है." (अल-मजमू, 11/576).

अल-अल्बानी (रह.) ने फ़रमाया: "इस्लाम के चारों मज़हब इस बात पर सहमत हैं, कि संगीत का सारे यंत्र हराम हैं. (अल-सहीहः, 1/145).
 
उपरोक्त उदहारण से यह पता चलता है कि इस्लाम में अधिकतर लोग संगीत को हराम (निषिद्ध) मानते हैं. परन्तु कौन क्या मानता है, यह आस्था का प्रश्न है. आप किसी को भी अच्छी बातें बता तो सकते हैं, परन्तु वह माने अथवा नहीं इसका फैसला तो उक्त व्यक्ति पर ही निर्भर होना चाहिए. मेरा धर्म किसी पर भी ज़बरदस्ती की इजाज़त नहीं देता है. क्योंकि धर्म का रिश्ता आस्था से है और आस्था पर केवल और केवल ह्रदय का ही वश चलता है.

अगर कोई यह मानता है कि इस्लाम में संगीत हराम है, तो वह अपने खून-पसीने की कमाई में से दी गई ज़कात को ऐसे कार्यों अथवा ऐसी जगह पर लगते हुए नहीं देख सकता है, जहाँ संगीत के प्रयोग जैसे बड़े धार्मिक नियमों का उल्लंघन होता हो.  इसमें एक बात और महत्वपूर्ण है, कि ज़कात और मदद में फर्क होता है. मदद की कोई कम या अधिक सीमा नहीं होती है, जबकि ज़कात अर्थात अपनी बचत में से 2.5 प्रतिशत देना हर एक के लिए आवश्यक होता है. जहाँ मदद किसी को भी कुछ भी देखे बिना दी जा सकती है, वहीँ ज़कात पूरी तरह छान-बीन करके ही दी जाती है, कि वह सही और आवश्यकता की जगह पहुँच रही है अथवा नहीं. इसमें यह भी देखना आवश्यक होता है कि जो व्यक्ति ज़कात मांग रहा है वह इसका हक़दार है भी अथवा नहीं, कहीं ऐसा तो नहीं कि वह खुद अपनी आजीविका चलाने का सामर्थ्य रखता हो तथा जो सामर्थ्य नहीं रखते उनका हक मार रहा हो. ऐसा पाए जाने पर उतने हिस्से की ज़कात दुबारा दिया जाना आवश्यक है.

अब ऐसे में ज़कात के पैसे से चलने वाले किसी 'शिविर' में अगर कोई व्यक्ति किसी प्रतिबंधित कार्य को करता है तो यह बिलकुल ऐसा है जैसे कोई मांसाहार को अनुचित समझने वाला व्यक्ति गरीब लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करे और भोजन ग्रहण करने वाले लोग मांसाहार की मांग करें और कहें कि हमारे देश में मांसाहार की इजाज़त है. तो क्या उनकी मांग उचित होगी???

रही बात मौहम्मद रफ़ी अथवा ए. आर. रहमान अथवा इन जैसे गायकों अथवा संगीतकारों की तो में किसी भी मनुष्य के ऊपर उसके कार्यों के द्वारा कमेंट्स नहीं कर सकता हूँ. वैसे भी केवल संगीत का प्रयोग करने भर से कोई इस्लाम से बाहर नहीं हो जाता है. इस्लाम से बाहर केवल वही हो सकता है जो कि ईश्वर को ना माने एवं उसके आदेशो को अपनी अक्ल से गलत ठहराए. और यह भी आवश्यक नहीं कि इंसान खुले-आम ईश्वर को मानने का ऐलान करे. इसलिए दुनिया में कौन काफिर है, यह तो केवल ईश्वर ही जानता है. इसलिए कुरआन में उसने दूसरों को काफ़िर बोलने से मना फ़रमाया है.

लेकिन किसी भी धार्मिक संस्था को उसके धर्म के अनुरूप राहत शिविर चलाने कि आज्ञा अवश्य होनी चाहिए. मेरा एक मित्र पास के ही एक वैदिक आश्रम में योग शिविर में हिस्सा लेने के लिए गया, परन्तु वहां उसको एक फॉर्म दिया गया जिसमें लिखा था कि वह अपनी इच्छा से 'ॐ' शब्द का उच्चारण तथा सूर्य नमस्कार करेगा, जिस पर उसको एतराज़ हुआ. हालाँकि उपरोक्त आश्रम को हमारी सरकार से भी अनुदान मिलता है, फिर भी मेरी उस मित्र को सलाह यही थी, कि उक्त आश्रम को अपने धर्म के हिसाब से 'योग शिविर' चलने का पूरा हक है. अगर तुम्हे उसके नियम पसंद नहीं आते हैं, तो उसमे हिस्सा लेने की कोई आवश्यकता नहीं है, परन्तु उसका विरोध करना अनुचित है.

फिर सबसे बड़ी बात तो यह है, कि जिस लोगो का आपने ज़िक्र किया वह एक शरणार्थी शिविर में रह रहे हैं, जहाँ पैसे की कमी की वजह से बहुत सी आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध नहीं होंगी. ऐसे में अपने थोड़े से पैसो को जीवन के लिए बहुत सी आवश्यक वस्तुओं पर खर्च करने की जगह टी.वी. जैसी वस्तुओं पर खर्च करना कोई अक्लमंदी का काम नहीं है. पैसे को बचा कर जल्द से जल्द ऐसे शिविरों की जगह अपने स्वयं के खर्च से अपने रहने का इंतजाम करना क्या अधिक अकलमंदी का कार्य नहीं है?

बात अगर दाऊद इब्राहीम, अबू सलेम, अब्दुल करीम तेलगी, अजमल कसाब और अफ़ज़ल गुरु जैसे अपराधियों एवं मानवता के दुश्मनों के बारे में की जाए है तो इनको अवश्य ही सख्त से सख्त सजा होनी चाहिए. अगर यह शरियत के तहत ज़िन्दगी बसर करते तो यह इतने जघंन्य अपराध करते ही नहीं. माननिये सुरेश जी, कृपया करके तालिबानी कानूनों को शरियत का कानून मानने की गलती नहीं करें.

अंत में एक बात कहना अति-आवश्यक है, सुरेश जी मेरे प्यारे वतन के निवासी होने के नाते मेरे भाई हैं तथा मुझसे बड़े होने के नाते उनकी इज्ज़त करना मेरा धर्म है. इसलिए अगर कहीं भी, कुछ भी गलत लिख दिया हो तो क्षमा का प्रार्थी हूँ और चाहता हूँ कि वह अवश्य ही मेरी गलती को मेरे संज्ञान में लाएं.

-शाहनवाज़ सिद्दीकी
Read More...

क्‍या इस्लाम अनुसार बच्चा गोद लेना सही है?

प्रश्न: क्या इस्लाम के अनुसार बच्चा गोद लेना सही नहीं है? क्या किसी को बेटा अथवा बेटी माना जा सकता है?

उत्तर: बच्चे को गोद लिया जा सकता है, बल्कि  गरीब बच्चों का पालन-पोषण करना पुन्य का काम है. परन्तु बालिग़ होने पर उनको सामान्यत: घर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा सकती हैं. यही नियम चचेरे-ममेरे भाईओं के लिए भी है. अर्थात उनके घर में प्रवेश से पहले घर की औरतों को अपने शरीर को सामान्य: नियमानुसार ढकना आवश्यक है.

जहाँ तक जायदाद में हिस्से की बात है, तो कोई भी किसी को भी अपनी जायदाद में हिस्सा दे सकता है, हाँ ऐसा हिस्सा अपने-आप नहीं होता है. अर्थात पिता की मृत्यु के पश्चात् (अगर उसके नाम जायदाद नहीं की गयी है) गोद लिए बच्चा जायदाद में हिस्से की मांग नहीं कर सकता है.

इस्लाम अनुसार किसी भी महिला के लिए मर्द की स्थिति दो तरह की होती हैं: महरम और ना-महरम. सामान्यत: ना-महरम वह होते हैं जिनके सामने परदे की आवश्यकता होती है (अर्थात मुंह और हाथ को छोड़ कर शरीर के सभी अंगो को ढकना आवश्यक होता है). ना-महरम उस श्रेणी में आते हैं जिनसे विवाह जायज़ होता है.

जिनसे खून अथवा दूध का रिश्ता होता है वह महरम की श्रेणी में आते हैं, और उनसे वैवाहिक सम्बन्ध नहीं बनाए जा सकते हैं. जैसे कि माता-पिता, सास-ससुर, बेटें-बेटियां, पति के बेटें-बेटियां, भाई-बहन, भतीजे-भतीजियाँ, भांजे-भांजियां इत्यादि.

Allah says : (Interpretation of Qur'an Surah An-Noor)


"And say to the faithful women to lower their gazes, and to guard their private parts, and not to display their beauty except what is apparent of it, and to extend their headcoverings (khimars) to cover their bosoms (jaybs), and not to display their beauty except to their husbands, or their fathers, or their husband's fathers, or their sons, or their husband's sons, or their brothers, or their brothers' sons, or their sisters' sons, or their womenfolk, or what their right hands rule (slaves), or the followers from the men who do not feel sexual desire, or the small children to whom the nakedness of women is not apparent, and not to strike their feet (on the ground) so as to make known what they hide of their adornments. And turn in repentance to Allah together, O you the faithful, in order that you are successful".


अल्लाह कुरआन में फरमाता है (जिसका मतलब है):


और ईमान वाली स्त्रियों से कह दो कि वे भी अपनी निगाहें बचाकर रखे और अपनी शर्मगाहों की रक्षा करें. और अपने श्रृंगार प्रकट न करें, सिवाय उसके जो उनमें खुला रहता है (अर्थात महरम) और अपने सीनों (वक्षस्थलों) पर दुपट्टे डाले रहे और अपना श्रृंगार किसी पर प्रकट न करे सिवाह अपने पति के या अपने पिता के या अपने पति के पिता के या अपने बेटों के अपने पति के बेटों के या अपने भाइयों के या अपने भतीजों के या अपने भांजो के या अपने मेल-जोल की स्त्रियों के या जो उनकी अपनी मिलकियत में हो उनके, या उन अधीनस्थ पुरुषों के जो उस अवस्था को पार कर चुकें हो, जिसमें स्त्री की ज़रूरत होती है,.या उन बच्चो के जो औरतों के परदे की बातों से परिचित ना हो. ..............[सुर: अन-नूर, 24:31] 

इस्लाम के अनुसार "माना हुआ" जैसे किसी रिश्ते की क़ानूनी मान्यता नहीं है. इस शब्द के जाल में आज भी चोरी-छिपे गुनाह होते हैं, कितने ही प्रेमी-प्रेमिका अपने पाप को समाज से छुपाने के लिए एक दुसरे को राखी बांध कर, दिखावे के बहन-भाई बन जाते हैं और "राखी" जैसी पवित्र भावना को बदनाम करते हैं.

"मुंह बोले" अथवा "माने हुए" रिश्ते को अगर मान्यता मिलती तो वह घर की अन्य महिलाओं के लिए "महरम" होते परन्तु खून अथवा दूध का सीधा रिश्ता ना होने की स्थिति के कारणवश व्यभिचार को बढ़ावा मिलता.
अंजुम जी ने बहुत ही ज़बरदस्त बात की तरफ इशारा किया है.

@ Anjum Sheikh ने कहा…
"जब हज़रत ज़ैद (रज़ी.) को हुजुर (स.) ने गोद लिया तो अल्लाह ने कुरान के ज़रिये बताया कि गोद लिए बच्चे का दर्जा महरम का नहीं हो सकता है. इसलिए आप (स.) उसको अपना नाम नहीं दे सकते हैं."


दर-असल प्यारे नबी (स.) ने गुलामों के हक की बात उठाई और लोगो को अपने गुलामों को आज़ाद करने के लिए प्रेरित करने हेतु अपने गुलाम हज़रत ज़ैद (र.) को आज़ाद किया. इसके साथ ही उन्होंने हज़रत ज़ैद (र.) को अपने मुंहबोले बेटे का दर्जा भी दिया तो अल्लाह ने कुरआन की आयत उतार कर उनको ऐसा करने से रोक दिया. ईश्वर ने कहा कि तुम उनको (अर्थात आज़ाद किये हुए गुलामों को) उनके बाप के नाम के साथ पुकारों और अगर तुम्हे उनके बाप का नाम नहीं पता है, तो उनको अपना भाई समझो.

[सुर: अल-अहज़ाब 33:4] ..... और ना उसने तुम्हारे मुंह बोले बेटों को तुम्हारे वास्तविक बेटे बनाए. ये तो तुम्हारे मुँह की बातें हैं. किन्तु अल्लाह सच्ची बात कहता है और वही मार्ग दिखता है.



[33:5] उन्हें (अर्थात मुँह बोले बेटों को) उनके बापों का बेटा कहकर पुकारो. अल्लाह के यहाँ यही अधिक न्यायसंगत बात है. और यदि तुम उनके बापों को न जानते हो, तो धर्म में वे तुम्हारे भाई तो हैं ही और तुम्हारे सहचर भी. इस सिलसिले में तुमसे जो गलती हुई हो उसमें तुमपर कोई गुनाह नहीं, कुन्तु जिसका संकल्प तुम्हारे दिलों ने कर लिया, उसकी बात और है. वास्तव में अल्लाह अत्यंत क्षमाशील, दयावान है.

क्योंकि दोनों में खून अथवा दूध का रिश्ता नहीं है, इसलिए मुँह बोले बेटों के घर की औरतों के लिए ना-महरम की स्तिथि होती और वहीँ उसके घर में भी गोद लेने वाले की स्तिथि ना-महरम की ही होती. इसलिए बेटों की जगह धर्म भाई मानना अधिक अच्छा है.

- शाहनवाज़ सिद्दीकी
Read More...

काफिर किसे कहते हैं? - शाहनवाज़ सिद्दीकी

काफिर शब्द का मतलब है "इन्कार करने वाला". अर्थात 'काफिर' उसे कहते हैं जो ईश्वर को पहचान कर भी अपने अहम् या दुष्टों की बातों में आकर या किसी और कारणवश उसके होने का या उसके किसी आदेश का इन्कार करे. अर्थात जिस तक ईश्वर का सन्देश पहुँच गया, वह उसका इन्कार कर दे, वह काफिर है. इसमें एक महत्वपूर्ण बात यह भी है, कि अगर किसी ने प्रभु से सत्य मार्ग को जानने की इच्छा ही नहीं की और आँख मूंद कर बस वही करता रहा जो उसके पूर्वज करते आ रहे हैं, तो वह भी इसी श्रेणी में आएगा. क्योंकि ईश्वर कुरआन में कहता है (जिसका अर्थ है) कि "वह ना चाहने वालो को धर्म की समझ नहीं देता".

कुरआन में आए ईश्वर के एक सन्देश पर ध्यान दीजिये:

02:62-Those who believe (in the Qur'an), those who follow the Jewish (scriptures), and the Sabians and the Christians, any who believe in God and the Last Day, and work righteousness, on them shall be no fear, nor shall they grieve.

2:62 निसंदेह, ईमान वाले और जो यहूद हुए और इसाई और साबिई, जो भी ईश्वर और अंतिम दिन पर ईमान लाया (विश्वास किया) और अच्छा कर्म किया, तो ऐसे लोगो का उनके अपने रब (पालने वाला) के पास (अच्छा) बदला है, उनको न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे.


उपरोक्त श्लोक (आयत) के अनुसार जिसने भी अल्लाह (ईश्वर) और इस ब्रह्माण्ड के आखिरी दिन अर्थात इन्साफ के दिन पर विश्वास किया और अच्छे कर्म किये उन्हें परलोक में इस लोक के सत्कार्यों का अच्छा बदला मिलेगा और उनको कोई ग़म नहीं होगा.

अब यह प्रश्न उठता है कि प्रभु को इस्लाम के अनुसार पहचानना या बस पहचानना?

उत्तर:
ईश्वर, ईश्वर है! इसमें इसलाम के अनुसार या विरुद्ध वाली कोई बात है ही नहीं. धर्म हमारे-तुम्हारे हिसाब से नहीं अपितु ईश्वर के हिसाब से चलता है. अर्थात ईश्वर ने जिसके ह्रदय में सत्य का ज्ञान प्रवाहित किया, लेकिन उसने उस सत्य को मानने से इनकार कर दिया, वह काफिर है. इसमें एक बात बहुत ही अधिक ध्यान देने की है. और वह यह कि ईश्वर एक है और उसका सत्य मार्ग भी एक ही है. जिसने भी ईश्वर से प्रार्थना कि उसे सत्य के मार्ग का ज्ञान दे, तो ईश्वर अवश्य उस मार्ग का ज्ञान अमुक मनुष्य को देगा. चाहे वह मनुष्य समुन्द्रों के बीचों-बीच, किसी छोटे से टापू में बिलकुल अकेला ही रहता हो. इसमें कोई दो राय किसी भी धर्म के पंडितो की हो नहीं सकती है.

इसलिए मनुष्य के लिए यह कोई मायने रखता ही नहीं कि वह किसी मुसलमान के घर पैदा हुआ है या फिर हिन्दू अथवा इसाई के घर. उसे तो बस अपने प्रभु से सत्य के मार्ग को दिखाने की प्रार्थना एवं प्रयास भर करना है. क्योंकि अब यह प्रभु का कार्य है कि अमुक व्यक्ति को "अपने सत्य" का मार्ग दिखलाये. प्रभु को पहचानना या न पहचानना किसी भी मनुष्य के वश की बात नहीं है, यहाँ तो सिर्फ प्रभु का ही वश चलता है और वह पवित्र कुरआन में कहता है कि:

"अगर कोई मनुष्य मेरी तरफ एक हाथ बढ़ता है, तो मैं उसकी तरफ दो हाथ बढ़ता हूँ, अगर कोई चल कर आता है तो मैं दौड़ कर आता हूँ."

मित्रो! हर धर्म की कसौटी पर यह बात सौ प्रतिशत सही उतरती है. इसलिए अगर इस राह पर चला जाय तो आपस के झगडे-फसाद हमेशा-हमेश के लिए समाप्त हो जाएँगे.

- शाहनवाज़ सिद्दीकी
Read More...